Self reliant india (आत्मनिर्भर भारत )
भारत की वो जनता है,
जो १०० रुपये रोज में भी अपने दिन का गुजारा कर लेती है।
परन्तु इन्हें जब कोई मदद, दान, सहयोग या सेवा भाव से कोई कुछ देता है, तो इन्हें 1000 रुपए भी कम लगते है, कम पड़ते है।
ऐसी सौच रखने वालों को समझना होगा कि जब आप अपनी मेहनत के 100 में गुजारा कर सकते थे तो आपको दूसरों के मेहनत के 1000 भी कम लगते है।
क्योकि मेहनत के 100 रु से भी मन मे सन्तुष्टी प्राप्त हो जाती है।
और अगर आपको आत्म निर्भर बनना है तो या तो आप अपनी मेहनत की क्षमता को बढ़ाये या आवश्यकता को घटाए, आवश्यकता नही घटा सकते है तो अपनी मेहनत को बढ़ाना पड़ेगा, अगर आप इन दोनो में से एक काम नही कर पाएंगे तो आप कभी भी आत्मनिर्भर नही बन पाएंगे।
कोई भी व्यक्ति हमेशा दान देने वाले को याद रखता है, दान लेने वाले को नही।
महाभारत के कर्ण को दानवीर कहा जाता था और आज भी उसे याद किया जाता है। और कर्ण के नाम से लोगो को उपमा भी दी जाती है, क्योकि वो दान देता था लेता नही था।
जब आप आत्मनिर्भर बनेंगे तभी किसी को दान देने लायक बनेंगे, और इतिहास में आपको भी याद किया जाएगा, इतिहास भी देने वाले को गर्व से याद करता है।
वरना याद तो हमारे देश को लूटने वाले को भी किया जाता है परन्तु गर्व से नही बल्कि शर्म से।
जब हम अपनी आदत, जरूरत और आवश्यकता को स्वयं अपनी मेहनत से पूर्ण करते है तभी हम आत्मनिर्भर होने के रास्ते पर चलने का प्रयास करते है।
हमारी आदत, जरूरत, और आवश्यकता की पूर्ति न होने पर जो दूसरों से मदद के लिए मुख देखने की आदत है वो कभी हमे आत्मनिर्भर नही बनने देंगी।
हमे जरूरत हैं आवश्यकता को कम करे या उनकी पूर्त्ति के लिए मेहनत बढ़ाये, खुद भी आत्मनिर्भर बने और भारत को भी आत्मनिर्भर बनाये
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