उमा भारती जी के पदचिन्ह (Footprints of uma bharti ji)

परम श्रेध्य उमा भारती जी, 

का जन्म आज से 59 साल पहले ग्राम डूंडा, जिला टीकमगढ़, मध्यप्रदेश के एक खुशहाल लोधी राजपूत किसान परिवार में हुआ। पिता गुलाब सिंह लोधी तथा माता बेटी बाई की 6 सन्तानो में उमा सबसे छोटी एवं सबकी लाड़ली थी।
उमा जी एक वर्ष की थी की पिता का गंभीर बिमारी से निधन हो गया।
पति के निधन से दुखी मां, उमा जी को अपनी गोदी में बिठाकर पंडितों से रामायण एवं गीता सुनती थी।
उमा जी तीव्र मेधा एवं स्मृति की धनी थी, इसलिए 6 वर्ष की उम्र होने तक उमा जी को रामायण एवं गीता कंठस्थ हो गए तथा वह स्वयं उन्हें दोहराने लगी। 
उनके ग्राम डूंडा के लोग इस बात से भौचक्के थे एवं उन्हें भगवान का अवतार मानने लगे, तथा उमा जी की ख्याति गाँव से बाहर पूरे टीकमगढ़ जिले में फ़ैल गई। गाँव में सरकारी स्कूल था, किन्तु शिक्षक उन्हें पढ़ाने की जगह उन्हें अपने कुर्सी पर बिठाकर, तथा उमा जी से ही क्लास लेने को कहते थे। यह अनोखी चर्चा जिले एवं मध्यप्रदेश के बुद्धिजीवी वर्ग एवं धार्मिक जगत में पहुंची। 1968 से, जब उमा आठवे वर्ष में लगी तो जिले में, मध्यप्रदेश में, एवं मध्यप्रदेश से बाहर अन्य राज्यों में भी रामायण- गीता पर उनके व्याख्यान होने लगे।
  • ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने जब उनका व्याख्यान सुना तो उन्हें पूरी तरह से अपनी छत्र-छाया में ले लिया। 

ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया
उसी समय राजमाता सिंधिया कांग्रेस से जनसंघ में आ गई तथा उसी समय से, 1969 से  उमा जी - उमा भारती जी के नाम से चर्चित हो गई, उन्हें सरस्वती (भारती) का अवतार कहा जाने लगा एवं उनका संपर्क उस समय के संघ के वरिष्ठ स्वयंसेवकों एवं जनसंघ के दिग्गज नेताओं से स्वाभाविक रूप से हो गया।
यही वह समय था, जब उन्हें परम पूजनीय गुरूजी (गोलवलकर जी) एवं प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) का सान्निध्य प्राप्त हुआ।
पूरे भारत में उमा जी की ख्याति फ़ैल चुकी थी, उनके लिए राजमाता सिंधिया जी ने गाड़ी, ड्राइवर, निजी सचिव सबकी व्यवस्था कर दी थी। तथा उमा जी के बड़े भाई श्रीमान स्वामी प्रसाद लोधी,उमा जी की देखरेख के लिए उनके साथ रहते थे।
9 वर्ष से लेकर 16 वर्ष की उम्र तक उमा जी भारत में प्रसिद्ध हो चुकी थी एवं संघ एवं जन संघ के वरिष्ठ लोगों के संपर्क में आ चुकी थी।
उमा जी को 1977 में इंग्लैंड में व्याख्यान देने का बुलावा आया।  वह भारत से बाहर भी इतनी लोकप्रिय हुई की 1977 से 1980 तक दुनिया के 50 देशों में उनके व्याख्यान हुए । जिनमें प्रमुखतः अफ्रीका, नॉर्थ अमेरिका, इंग्लैंड के साथ पूरा यूरोप तथा एशिया के मलेशिया, इंडोनेशिया, जापान , हॉंग-कॉंग और सिंगापुर जैसे देश शामिल थे।  इस तरह से 16 वर्ष से 20 वर्ष की आयु के बीच में उमा जी ने विश्व के सर्वश्रेष्ठ प्रवचनकारों में अपना स्थान बना लिया। 
  • 1980 में अपनी मां की आज्ञा से गांव में अपने गांव में अपनी मां के साथ एक वर्ष रही।  मां उमा जी को गृहस्थी बसाते देखना चाहती थी।  उसी समय अचानक उमा जी की मां बीमार पड़ी एवं उनका निधन हो गया। मां की मृत्यु के गहरे आघात से उबरने के लिए उमा जी ने अपने समर्थकों से नाता तोड़ लिया एवं अपने ही गांव में रहने लगी।  1981 में मां के निधन के बाद 1984 तक उमा जी ने भारत की गरीबी -शोषण का विकराल रुप अपने एवं आस-पास के गांव में देखा, तो उनकी जीवन की दिशा बदल गई। गरीबी एवं अन्याय तथा इतनी बड़ी आर्थिक विषमता को देखकर आगे की दिशा तय करने के लिए उमा जी ने नए सिरे से अपने भाई स्वामी प्रसाद लोधी जी के देख-रेख में अध्ययन शुरू किया, जिसमें स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद, डॉ राधाकृष्णन, मार्क्स, माओ, लेनिन व अन्य को पढ़ा। हनुमान जी महाराज, शिवाजी महाराज एवं साम्यवादी क्रांतिकारी चेग्वेवारा उनके प्रेरक तत्त्व बन गए । और ' श्रीमद् भागवत गीता" तथा अमेरिका में रहने वाले अश्वेत लोगों के गुलामी के दिनों के शोषण एवं संघर्ष  पर लिखी हुई एलेक्स हेली की पुस्तक 'रूट्स', इन दो पुस्तकों ने उन्हें जीवन जीने की नई प्रेरणा और दिशा प्रदान की। इसी दरम्यान घुड़सवारी, शूटिंग, ड्राइविंग एवं कविता लिखने जैसे शौक भी उमा जी के दिनचर्या का अंग बन गए।
बुंदेलखंड के उस पिछड़े इलाके में उमा जी का व्यक्तित्व सबके लिए श्रद्धा एवं आश्चर्य का केंद्र था। गरीबों के लिए जान लगा देने और संघर्ष करने की उनकी प्रवृति से उनके बारे में नई चर्चा शुरू हुई और फिर राजमाता विजयाराजे सिंधिया जी ने फिर से उनके जीवन में दखल दिया एवं उन्हें खजुराहो लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया।
21 वर्ष से 27 वर्ष की आयु तक (1981-88) उनको गृहस्थ जीवन बसाने के लिए परिवार वालों व राजमाता सिंधिया जी ने प्रेरित किया ,किन्तु उमा जी  के मन में अनिश्चय की स्थिति बनी रही एवं उन्होंने सही समय आने परपर संन्यास लेने की इच्छा जाहिर की।
17 नवम्बर 1992 को उडुपी, कर्नाटक के कृष्ण भक्ति संप्रदाय के महान प्रतिष्ठा प्राप्त संत- श्री विश्वेश तीर्थ महाराज (पेजावर स्वामी) जी से नर्मदा के किनारे, मध्यप्रदेश अमरकंटक में संन्यास की दीक्षा ली एवं उमा भारती जी की जगह उमा श्री भारती जी हो गयी ।
उमा जी के जीवन पर उनकी मां, उनके बड़े भाई स्वामी प्रसाद जी लोधी, उनके गुरु श्री पेजावर स्वामी जी, राजमाता विजयाराजे सिंधिया जी, अशोक सिंघल जी, प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया ) जी, एवं श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी जी का अमिट प्रभाव रहा।
1989 से 1998 तक वो खजुराहो से 4 बार सांसद रहीं तथा उनके संसदीय क्षेत्र की चर्चा पूरे संसार में हुई, फिर पांचवा चुनाव 1999 में वह भोपाल से लड़ी एवं रिकॉर्ड मतों से जीतीं।

  • इसी कालखंड में संगठन में वह पहले मध्यप्रदेश भाजपा की उपाध्यक्ष बनीं, फिर युवा मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष, फिर पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव तथा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहीं।
फिर इसके बाद 1998 में अटल जी की सरकार में पहले राज्यमंत्री, फिर कुछ ही महीनों के बाद स्वतंत्र प्रभार तथा फिर उसके तुरंत बाद कैबिनेट मिनिस्टर बनीं।  1998  से 2003 तक शिक्षा, खेल-कूद, पर्यटन, कोयला एवं खनन उनके विभाग रहें। एक मंत्री के रुप में 1998 से 2003 तक उनकी निरंतर सराहना एवं प्रशंसा हुई। फिर 2003 में उनके नेतृत्व में मध्यप्रदेश विधानसभा का चुनाव हुआ तथा 230 सीटों में से 173 सीटों पर भाजपा  विजय दिलाकर वह मध्यप्रदेश के इतिहास में दो-तिहाई से अधिक बहुमत प्राप्त करने वाली भाजपा की पहली मुख्यमंत्री बनीं। मध्यप्रदेश में उमा जी का मुकाबला उस समय के कांग्रेस के दिग्गज नेता तथा दस साल से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री  दिग्विजय सिंह से हुआ।  भारत के राजनैतिक चुनावों के इतिहास  बहुत ही रोमांचकारी मुकाबला था। उमा जी महिला थी, पिछड़े वर्ग की थीं, 42 वर्ष की  थी, हिंदुत्व एवं राष्ट्रवाद की योद्धा थीं, सामंतवाद एवं शोषण के खिलाफ थीं एवं अटलजी के मंत्रिमंडल की वरिष्ठ मंत्री थी इसलिए दिग्विजयसिंह उनके मुकाबले कमजोर पड गए।
उमा जी के मुख्यमंत्रित्व के काल में ही मध्यप्रदेश के आधुनिक विकास की नींव पडी।  सड़क, बिजली, पानी, एवं बेरोजगारी पर उन्होंने अपना ध्यान केंद्रित किया।  उनके मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद भी गौर जी एवं शिवराज जी की सरकारें भी उसी एजेंडे को मानती रही।
एक प्रखर योद्धा एवं साहसी नेता के रुप में उमा जी की प्रतिष्ठा भाजपा में एवं भारत की राजनीती में प्रमुख तीन कारणों से हुई - 
(i)अयोध्या आंदोलन के 2 नवम्बर 1990 के कार सेवकों के जत्थे का उन्होंने अयोध्या में नेतृत्त्व किया एवं विवादास्पद ढाँचे पर केसरिया पताका फहरा दी गई। वह उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह की जेल से, बांदा से कैसे निकलकर अयोध्या पहुँच गईं एवं कार  सेवकों का नेतृत्त्व किया, यह बुंदेलखंड में लोक-गीतों और लोक-गाथाओं का विषय हो गया हैं।
(ii)जब युवा मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं तब युवा मोर्चा की लोकप्रियता को उन्होंने उत्कर्ष पर पहुंचाया एवं असम में घुसपैठ के खिलाफ भीषण जान आंदोलन छेड़ा एवं लाखो लोगों की मानव-दीवार बनाई। वह पांच साल तक युवा मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष रहीं।
(iii) फिर कर्नाटक के हुबली धारवाड़ के ईदगाह मैदान में, जहां 1980 से तिरंगा फहराने पर रोक लगी थी, लाखों युवाओं के साथ गोलियों की बरसात के बीच में उमा भारती जी के नेतृत्त्व में वहां तिरंगा फहरा दिया गया, जिससे उमा जी पर वहां की तत्कालीन कांग्रेस की सरकार ने कई केस दर्ज किए।
जब मुख्यमंत्री के रूप में उमा जी की लोकप्रियता भारत के राजनीति में एक नई जगह बना रही थी, तभी 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं हो सका और श्रीमती सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनाने की चेष्टा की। उमा जी ने सोनिया के इस दावे को चुनौती दी, जिसके फलस्वरुप मनमोहनसिंह जी प्रधानमंत्री बनें, फिर उमा जी से बदला लेने के लिए कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार ने हुबली के तिरंगा आंदोलन के समय के केस निकालकर उमा जी को वारंट भेजा । जिस पर उमा भारती जी ने मुख्यमंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया एवं कर्नाटक में जाकर अपनी गिरफ्तारी दी।

उनकी गिरफ्तारी के विरोध में अटलजी एवं आडवाणी जी के नेतृत्त्व में पूरे देश के भाजपा कार्यकर्ताओं ने बैंगलोर में जाकर गिरफ्तारियां दीं। कांग्रेस की सरकार को उमा जी को बिना किसी शर्त जेल से रिहा करना पड़ा और फिर हुबली, कर्नाटक से अमृतसर,पंजाब तक उमा भारती जी की तिरंगा यात्रा हुई, जिससे उन्हें और अधिक प्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठावान बना दिया। फिर सितम्बर 2004 से 2011 तक- इन सात सालों में उमा जी ने जिंदगी एवं संगठन की अंदरूनी राजनीती का नया रूप देखा, जिसमें उन्हें महासचिव बनाया गया,फिर सार्वजनिक तौर पौर पर आडवाणी जी को चुनौती देने के कारण उन्हें पार्टी से बाहर किया गया,फिर उनको वापस लिया गया,बिहार का प्रभारी बनाया गया। फिर उनकी एवं पार्टी के अन्य महासचिवों के साथ जो मतभेद हुए, उसके कारण उन्हें फिर पार्टी से बाहर निकाला गया, अंततः उनकी वापसी नितिन गडकरी जी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के बाद 2011 में भाजपा में फिर से हुई।
पार्टी से अलग किए जाने के बाद उमा जी ने अपनी खुद की पार्टी- भारतीय जन शक्ति बनाई, 
लेकिन उमा जी ने हिंदुत्व एवं राष्ट्रवाद की विचारधारा को नहीं छोड़ा।  उनके द्वारा गठित पार्टी का अधिष्ठान भी यही दो तत्त्व रहे। 
इसके कारण संघ के वरिष्ठ स्वयंसेवकों एवं भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के बीच उनके प्रति सम्मान एवं आत्मियता बनी रही और उन्ही सब वरिष्ठजनों ने मिलकर उमा जी की ऐसी घेराबंदी की कि नितिन गडकरी जी उनको भाजपा में वापस लाने में सफल रहें।
वह 2010 से गंगा आंदोलन  संलग्न हो चुकीं थीं, नितिन जी ने उनको भाजपा में लाकर इस अभियान से जोड़े रखा।  नितीन जी के बाद जब राजनाथ जी अध्यक्ष बनें तो उमा जी को उन्होंने भाजपा का उपाध्यक्ष बनाया एवं गंगा अभियान का प्रभारी बनाया। जब श्रीमान नरेंद्र मोदी जी की प्रचंड बहुमत से सरकार बनी  तो मोदी जी के मंत्रीमंडल में उमा भारती जी फिर से कैबिनेट मिनिस्टर बनी तथा जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण उनके विभाग हुए।  इनमें वह तीन साल रही। फिर इसके बाद पेयजल और स्वच्छता विभाग की मंत्री बनी। 2019 से वर्तमान में भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।
2011 से उनका राजनैतिक क्षेत्र मध्यप्रदेश से उत्तरप्रदेश हो गया, तथा शायद वो देश की पहली नेता हैं जो एक राज्य की मुख्यमंत्री होने के बाद दूसरे राज्य में विधानसभा का चुनाव जीतीं एवं फिर झाँसी से सांसद बनी तथा 2017 के उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी उत्तरप्रदेश में चार चेहरों के नेतृत्त्व में चुनाव हुआ, एवं पार्टी के तरफ से अधिकृत प्रचार अभियानों में जिन चार चेहरे नेता के तौर पर दिखाये गए वह राजनाथ सिंह जी, उमा श्री भारती जी, केशव प्रसाद मौर्य जी एवं कलराज मिश्र जी थे।
मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड के जिला टीकमगढ़ के एक लोधी जाती के किसान परिवार में पैदा हुई उमा जी, सफलता के अभूतपूर्व शिखर पर पहुंची हैं। जब वो झांसी में सांसद थी तो दिनांक १५ फरवरी, 2019 को झांसी में हुई रैली में स्वयं प्रधानमंत्री मोदी जी ने अपने भाषण में एक मंत्री के तौर पर अपने सहयोगी के रूप में एवं झांसी के समर्पित सांसद के रूप में लाखों लोगों के सामने उनके योगदान की भारी प्रशंसा की जिससे झांसी की जनता की जनता एवं  उनके सहयोगी एवं समर्थक गर्व एवं प्रसन्नता में सरोबार हो गए। 
भारत की राजनीति में एवं भाजपा की भी राजनीति में उमा श्री भारती जी  एक ऐसा व्यक्तित्त्व हैं जो धर्म के क्षेत्र में विश्व प्रसिद्ध हुईं, भारत में हिंदुत्व एवं राष्ट्रवाद की प्रखर योद्धा एवं अगुवा रही, चुनावी राजनीति में प्रचंड सफलता हासिल की, सत्ता की राजनीति में केंद्रीय कैबिनेट मंत्री एवं मुख्यमंत्री जैसे स्थान प्राप्त किये,अपनी ही पार्टी के संघटन में युवा मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष, फिर फिर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं राष्ट्रीय महासचिव बनीं। 
उनके परिवार की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी तथा संगठन,सत्ता एवं चुनाव की सारी सफलताएं उन्होंने 27 वर्ष की उम्र से 42 वर्ष की उम्र तक ही प्राप्त कर ली थी। आज वो भारत की राजनीति का दुर्लभ व्यक्तित्व हैं एवं अपने परिवार, अपना समाज, उनका अपना संघठन भारतीय जनता पार्टी तथा भारत एवं पूरे विश्व में उनके समर्थक गर्व एवं स्नेह से उनका नाम लेते हैं। इस हिसाब से उमा श्री भारती जी बेमिसाल हैं।

उनसे उनके बारें में पूछा जाए तो वह कहती हैं –
  • मैं अपनी मां की एक साधारण सी बेटी एवं अपने गुरु की सामान्य सी सन्यासी शिष्या हूं, जिसे भगवत कृपा से असाधारण उपलब्धियां प्राप्त हुई हैं, किन्तु मैं तो एक साधारण मनुष्य ही हूं। 
ईश्वर मेरे भारत देश मे ऐसी हजारों उमा भारतीयों को जन्म देना जो नारी शक्ति होने के साथ देश ओर दुनिया मे एकता, मानवता, ओर हिन्दू धर्म की मिसाल कायम करें। 
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कोटी कोटी प्रणाम ऐसी धर्मात्मा को। 
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